Thursday, December 8, 2011

मुठ्ठी भर रौशनी / अमरजीत कौंके



सब कुछ ख़त्म नहीं हुआ अभी

शेष है अब भी
मुठ्ठी भर रौशनी
इस तमाम अँधेरे के खिलाफ

खेतों में अभी भी लहलहाती हैं फसलें
पृथ्वी की कोख तैयार है अब भी
बीज को पौधा बनाने के लिए..

किसानों के होठों पर
अभी भी लोक गीतों की ध्वनियाँ नृत्य करती हैं
फूलों में लगी है
एक दुसरे से ज्यादा
सुगन्धित होने की जिद
इस बारूद की गंध के खिलाफ

शब्द अपनी हत्या के बावजूद
अभी भी सुरक्षित हैं
कविताओं में

और इतना काफी है......

098142 31698

Friday, June 17, 2011

कुछ नहीं होगा / अमरजीत कौंके




कुछ नहीं होगा / अमरजीत कौंके

सब कुछ होगा तुम्हारे पास
एक मेरे पास होने के अहसास के बिना

सब कुछ होगा मेरे पास
तुम्हारी मोहब्बत भरी
इक नज़र के सिवा

ढँक लेंगे हम
पदार्थ से खुद को
इक सिरे से दुसरे सिरे तक

लेकिन कभी
महसूस कर के देखना
कि सब कुछ होने के बावजूद
कुछ नहीं होगा हमारे पास
उन पवित्र दिनों की मोहब्बत जैसा

जब मेरे पास कुछ नहीं था
जब तुम्हारे पास कुछ नहीं था.......

Friday, November 5, 2010

ख़ुशी / अमरजीत कौंके


ख़ुशी / अमरजीत कौंके

तुम खुश होती हो
मेरा गरूर टूटता देख कर

मुझे हारता हुआ देख
तुम्हें अत्यंत ख़ुशी होती है

मैं खुश होता हूँ
तुम्हें खुश देख कर

तुम्हें जीतता
देखने की ख़ुशी में
मैं
हर बार
हार जाता हूँ........

Saturday, October 16, 2010

मछलियाँ / अमरजीत कौंके




उस की उम्र में
तब आया प्यार
जब उसके बच्चों की
प्यार करने की उम्र थी
तब जगे
उसके नयनों में सपने
जब परिंदों के
घर लौटने का वक्त था

उसकी उम्र में
जब आया प्यार
तो उसे
फिश एकुएरियम में
तैरती मछलियों पर बहुत
तरस आया
फैंक दिया उसने
काँच का मर्तबान
फर्श पर
मछलियों को
आज़ाद करने के लिए

लेकिन
तड़प तड़प कर
मर गईं मछलियाँ
फर्श पर
पानी के बगैर

नहीं जानती थी
वह बावरी
कि
मछलियों को
आज़ाद करने के भ्रम में
उसने मछलियों पर
कितना जुलम किया है.....

098142-31698

Sunday, September 26, 2010

तुम्हारी देह जितना / अमरजीत कौंके



देखे बहुत मैंने
मरुस्थल तपते
सूरज से
अग्नि के बरसात होती
देखी कितनी बार
बहुत बार देखा
खौलता समुंदर
भाप बन कर उड़ता हुआ
देखे ज्वालामुखी
पृथ्वी की पथरीली तह तोड़ कर
बाहर निकलते

रेत
मिटटी
पानी
हवा
सब देखे मैंने
तपन के अंतिम छोर पर

लेकिन
तुम्हारी देह को छुआ जब
महसूस हुआ तब
कि कहीं नहीं तपन इतनी
तुम्हारी काँची देह जितनी

रेत
न मिटटी
पानी न पवन
कहीं कुछ नहीं तपता

तुम्हारी देह जितना......

098142-31698

Saturday, August 7, 2010

कविता संग निपट अकेला / अमरजीत कौंके



सुख था जितना बाँट दिया सब
दुःख था जितना मन पर झेला
मैं कविता संग निपट अकेला....

अपने आंसू रही भीगती
अपनी सूखी काया
जीवन गुज़रा मिली कहीं न
सघन बृक्ष की छाया
गहन उदासी मन पर छाये
उतरे साँझ की बेला
मैं कविता संग निपट अकेला.....

लाख दरों पर दस्तक दे दी
खुला कोई न द्वार
ख़ामोशी का गहरा सागर
कर न पाया पार
मन के आँगन अब भी लगता
स्मृतिओं का मेला
मैं कविता संग निपट अकेला....

इन नयनों ने भूले भटके
जब भी देखे सपने
कागज़ की कश्ती के जैसे
डूब गए सब अपने
रेत-घरौंदे टूटे आया
जब पानी का रेला
मैं कविता संग निपट अकेला.........

098142-31698

Tuesday, June 22, 2010

दुखों भरी संध्या / अमरजीत कौंके



जितनी देर दोस्त थे
कितनी सहज थी जिन्दगी
ना तुम औरत थी
ना मै मर्द
एक दुसरे का दर्द
समझने की कोशिश करते.....

अचानक
पता नहीं क्या हादिसा हुआ
जिस्म से जिस्म छुआ
हम बँट गए
औरत और मर्द में
मोहब्बत की ख़ुशी में
प्यार के दर्द में

अब मिलते हैं
तो सहज नहीं
दिलों में चोर है
मिलते तो खुश होते
विछुड़ते तो कायनात की उदासी
नयनों में भर के
सड़कों चौराहों से डर के
कितने गुनाह कर के

लेकिन
मेरी दोस्त
फिर भी यूँ नहीं लगता
कि विछुड़ने की यह
दुःख भरी संध्या
कितनी प्यारी है...

उदासी है चाहे जानलेवा
लेकिन दुनिया की
सब खुशिओं पर भारी है............