Thursday, August 27, 2009

जब से तुम गई हो माँ / अमरजीत कौंके


जब से तुम
गई हो माँ !
घर तिनकों की तरह
बिखर गया है.....

तुम पेड़ थीं एक
सघन छाया से भरा
घर के आँगन में खडा
जिस के नीचे बैठ कर
सब विश्राम करते
बतिआते
एक दुसरे के
दुःख सुख में
सांझीदार बनते.....

तुम चली गई माँ !
तो वो पेड़
जड़ से उखड़ गया है

वैसे
तुम्हारे जाने के बाद
सब वैसे का वैसे है
घर की दीवारें
घर की छतें
पर बदल गए हैं
उन छतों के
नीचे रहते लोग

घर का आँगन वही है
लेकिन आँगन का
वो सघन छाया भरा
बृक्ष नहीं रहा
जिस के नीचे
बैठ कर
सभी
एक दुसरे से
बतिआते थे
अपने अपने
दुःख सुख सुनाते थे

अब वो
बृक्ष नहीं रहा माँ !

जब से तुम चली गई........

10 comments:

Ishwar said...

क्या खूब लिखा हैं आँख भर आई ये अहसास बच्चो को तभी होता हें जब माँ चली जाती हें
भूतनाथ का गाना अब क्या दुन्ढे पगले डूब गया सूरज कब का ( समय का पहिया चलता हें )
वही भाव

वन्दना अवस्थी दुबे said...

लेकिन आँगन का
वो सघन छाया भरा
बृक्ष नहीं रहा
जिस के नीचे बैठ कर
सभी एक दुसरे से
बतिआते थे
अपने अपने
दुःख सुख सुनाते थे

बहुत सुन्दर. आपकी किताब का अभी तक इन्तज़ार कर रही हूं.

ओम आर्य said...

बेहद भावपुर्ण .........माँ की याद आ गयी.......आप ऐसे ही लिखते रहे.

shama said...

हर माँ को ऐसा बेटा नसीब हो ,जो उसे इस तरह याद kare!

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M.A.Sharma "सेहर" said...

Bhavuk kar dene wali abhivyakti !!

Anonymous said...

BAHUT KHOOBSOORAT YAAD HAI MA KI.

अनिल कान्त : said...

माँ के ऊपर एक बेहद भावपूर्ण कविता है ये....बहुत अच्छी

apnesapne said...

amarjeet ji ko pranam
sahi kaha hai apne Maa har Ghar ka vraksh hoti hai.. aur vraksh ke baad hi uski chaya ki kami ka pata chalta hai...

usha rai said...

जब से तुम
गई हो माँ !
घर तिनकों की तरह
बिखर गया है.....
bahut hi mermsprshi kvita hai.......

Sujata said...

First one is almost like a sufi poem, addressing loved one as well as almost seems like addressing god at the same time!