Saturday, October 31, 2009

पता नहीं / अमरजीत कौंके



पता नहीं
कितनी प्यास थी उसके भीतर
कि मैं
जिसे अपने समुद्रों पर
बहुत गर्व था
उसके सामने
पानी का एक छोटा-सा
क़तरा बन जाता

पता नहीं
कितनी अग्नि थी उसके भीतर
कि मैं
जिसे अपने सूरजों पर
बहुत गर्व था
उसके सामने
एक छोटा-सा
जुगनूँ बन जाता

पता नहीं
कितना प्यार था उसके भीतर
कि मैं
जिसे अपनी बेपनाह मोहब्बत पर
बहुत गर्व था
उसके सामने
मेरा सारा प्यार
एक तिनका मात्र रह जाता

पता नहीं
कितनी साँस थी उसके भीतर
कि मैं
जिसे अपनी लम्बी साँसों पर
बहुत गर्व था
उसके पास जाता
तो मेरी साँस टूट जाती

पता नहीं
कितने मरूस्थल थे उसके भीतर
कि मैं
जिसे अपने जलस्रोतों पर
बहुत गर्व था
उसकी देह में
एक छोटे से झरने की भांति
गिरता और सूख जाता

पता नहीं
कितने गहरे पाताल थे उसके भीतर
कि मैं
जिसे
बहुत बड़ा तैराक
होने का भ्रम था
उसकी आँखों में देखता
तो अंतहीन गहराइयों में
डूब जाता
डूबता ही चला जाता।
098142 31698

10 comments:

shelly chandigarh said...

पता नहीं
कितने गहरे पाताल थे उसके भीतर
कि मैं
जिसे
बहुत बड़ा तैराक
होने का भ्रम था
उसकी आँखों में देखता
तो अंतहीन गहराइयों में
डूब जाता
डूबता ही चला जाता।

bahut hi sunder.....aap ne aurt ke bahut vishal roop ko chitrat kia hai, jise marad ki ego aam taur par kabool nahi karti....congrates

paramjit momi canada said...

apkee kavita..."pata nahian" padi. uskee tariff sabdoo maian karna mera vash maian nahee. kuch bhee likhongee tu sabad kum padd jaianga...

Congratulations!!!!for a beautiful creation.

वन्दना said...

aah! aur waah!
dono ek sath...........sach kitna gahan likhte hain aap........tarif ko shabd kam pad jate hain.
ye rachna aap mujhe mail kar sakte hain.........dil ko choo gayi.

Suman said...

उसकी आँखों में देखता
तो अंतहीन गहराइयों में
डूब जाता
डूबता ही चला जाता।nice

usha rai said...

उसकी आँखों में देखता
तो अंतहीन गहराइयों में
डूब जाता
डूबता ही चला जाता।
अमरजीत जी आप सौन्दर्य के चितेरे है ,
ये तो जानती थी मै,पर इस कविता प्रेम और
सम्वेदनात्मक जान डाल दी है आपने !
ये कविता यदि प्रेम की कविता है ,तो
पहले वाली मिल का पतथर है !
हार्दिक बधाई स्वीकार करें !

ओम आर्य said...

उसकी आँखों में देखता
तो अंतहीन गहराइयों में
डूब जाता
डूबता ही चला जाता।

वाह क्या बात कर दी है आपने ..........सच मे आंखो की गहराई का थाह पाना मुश्किल काम है आंखे हमेशा से ही सच बोलती है अगर आप उन आंखो मे प्यार हो तो गहराई मापना सम्भव नहिहै सही कहा बन्धुवर.......बधाई!

पदमजा शर्मा said...

अमरजीत जी ,
किसी को प्यार करना और उस प्यार को सिर आँखों पर बिठाना ,प्यार की गहराई को बताता है .भावों की यह नदी सदा बहती रहे आपके भीतर .

शरद कोकास said...

अपने शिल्प मे और कथ्य मे दोनो मे ही यह कविता सुन्दर है ।

महावीर said...

उसकी आँखों में देखता
तो अंतहीन गहराइयों में
डूब जाता
डूबता ही चला जाता।
बहुत सुन्दर! भावों से ओत-प्रोत और शब्द जैस नगीनों की तरह जड़े हों. बधाई.
महावीर शर्मा

पारूल said...

पता नहीं
कितनी प्यास थी उसके भीतर
कि मैं
जिसे अपने समुद्रों पर
बहुत गर्व था
उसके सामने
पानी का एक छोटा-सा
क़तरा बन जाता

vaah..

जो छबि देखी पियु की ....मै अपनी भूल गई ....