Friday, November 6, 2009

बहुत दूर / अमरजीत कौंके



बहुत दूर
छोड़ आया हूँ मैं
वो खाँस-खाँस कर
जर्जर हुए ज़िस्म
भट्टियों की अग्नि में
लोहे के साथ ढलते शरीर
फैक्ट्रियों की घुटन में कैद
बेबसी के पुतले
मैं
बहुत दूर छोड़ आया हूँ

दूर छोड़ आया हूँ
वह पसीने की बदबू
एक-एक निवाले के लिए
लड़ा जाता युद्ध
छोटी-छोटी इच्छाओं के लिए
जिबह होते अरमान
दिल में छिपी कितनी आशाएँ
होठों में दबा कितना दर्द
मैं
कितनी दूर छोड़ आया हूँ

दूर छोड़ आया हूँ
मैं वह युद्ध का मैदान
जहाँ हम सब लड़ रहे थे
रोटी की लड़ाई
अपने-अपने मोर्चों में

पर मुझे मुट्ठी भर
अनाज क्या मिला
कि मैं सबको
मोर्चों पर लड़ता छोड़ कर
दूर भाग आया हूँ

वे सब अभी भी
वैसे ही लड़ रहे हैं
अंतहीन लड़ाई
उदास
निराश
फैक्ट्रियों में
तिल-तिल मरते
सीलन भरे अँधेरों में गर्क होते
मालिक की
गन्दी गालियों से डरते
थोड़े से पैसों से
अपना बसर करते
पल पल मरते

वे सब
अभी भी
वैसे ही लड़ रहे हैं

मैं ही
बहुत दूर
भाग आया हूँ।

098142-31698

8 comments:

ओम आर्य said...

बेहद मार्मिक है बन्धुवर .........आंखे नम हो गयी!यह कैसी त्रासदी है जिन्दगी जीने की मज्बूरी या जिन्दगी मे होने की समझ मे नही आती!

वन्दना said...

bahut hi dard sameta hua hai.

Harkirat Haqeer said...

वाह.....अमरजीत जी बहुत ही लाजवाब लिखते हैं आप ...आपकी कविताओं में बहुत ही गहराई होती है चाहे जिस विषय में भी लिखें .....!!

shelly chandigarh said...

amarjeet...ap man ke itne khubsurat hain kya kahun....sb sch jhuth ap kush bhi chhipa ke nahi rakh sakte apni kavita se.....

Anonymous said...

मज़दूरो की थीम पर अच्छी कविता है कुछ चीज़े उनके शोषण और शोषण के कारणो पर भी होना चाहिये ।

SHARAD KOKAS said...

मज़दूरो की थीम पर अच्छी कविता है कुछ चीज़े उनके शोषण और शोषण के कारणो पर भी होना चाहिये ।

दिगम्बर नासवा said...

lajawaab sir ... jeevan ki jaddojehad se joojh kar kuch log aa jaate hain apr kuch log ant tak ladte rahte hain jeevan se .... gahrer bhaav liye lajawaab rachna ...

indu said...

अमरजीत जी
नमस्ते
'जैसे विदेशो मे कमाने गए अपनों की तकलीफ को hi प्रस्तुत किया है आपने '
वहां क्या मजदूर ,क्या अधिकारी शारीरिक,आर्थिक शोषण ,असमानता का अपमानजनक व्यवहारइन सब का सामना करना पड़ता है
कुछ कमा लेंगे तो अपने वतन लौट कर शायद अच्छा जीवन जीने जैसी
हालत हो जाए और सब सहते रहते है .
यहाँ मजदूरों की स्थिति 'ऐसी' आज भी नही है ,कहीं बेहतर है
मुझे विदेशो मे काम करने गए लोग hi हर जगह दिखाई पड़ रहे हैं आपकी
कविता मे ,सम्वेदनशील हैं इसीलिए 'छोड़ आए' पर उनके दर्द ने पीछा नही छोड़ा ,साथ चला आया और अब तक आपमें समय हुआ है .