Saturday, July 18, 2009

अंतहीन दौड़ / अमरजीत कौंके


मैं रेस का घोड़ा हूँ
मुझ पर हर किसी ने
अपना अपना दांव लगाया है

किसी ने ममता
किसी ने फर्ज़
संस्कार परम्पराएं
कहीं मोहब्बत, मोह , भय
किस किस तरह का
वास्ता पाया है

अनगिनत सदिओं से
मैं दौड़ रहा हूँ
अंतहीन दौड़

दौड़ता दौड़ता कभी गिरता हूँ
उठता हूँ
और फिर दौड़ने लगता हूँ

मेरी कोई जीत मेरी नहीं
मेरी कोई हार मेरी नहीं
मेरा कुछ भी मेरा नहीं

मोह, मोहब्बत, ममता,
रिश्तों का क़र्ज़ उतारने के लिए
मैं लगातार दौड़ रहा हूँ
अंतहीन दौड़

मैं लगातार दौड़ रहा हूँ

और पीछे छूटती जा रही हैं कविताएँ..................

1 comment:

vandana said...

kitna satik likha hai...........ye rishton ,samaj ,bhavnaon ke neeche pista , dabta aadmi kab se isi antheen daud mein shamil hai...........aur na jaane kab tak aisa hi chalta rahega...behtreen prastuti.

aap mere blog par bhi aaiyega aapko achcha lagega.
http://vandana-zindagi.blogspot.com
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