Tuesday, November 17, 2009

करामात /अमरजीत कौंके



मैं अपनी प्यास में
डूबा रेगिस्तान था.......

मुद्दत से मैं
अपनी तपिश में तपता
अपनी अग्नि में जलता
अपनी काया में सुलगता

भुला बैठा था मैं
छांव
प्यास
नीर...

भूल गए थे मुझे
ये सारे शब्द
शब्दों के सारे मायने
मेरे कण-कण ने
अपनी वीरानगी
अपनी तपिश
अपनी उदासी में
बहलना सीख लिया था

पर तेरी हथेलियों में से
प्यार की
कुछ बूँदें क्या गिरीं
कि मेरे कण-कण में
फिर से प्यास जाग उठी

जीने की प्यास
अपने अन्दर से
कुछ उगाने की प्यास

तुम्हारे प्यार की
कुछ बूँदों ने
यह क्या करामात कर दी
कि एक मरुस्थल में भी
जीने की ख्वाहिश भर दी।

098142 31698

11 comments:

वन्दना said...

तुम्हारे प्यार की
कुछ बूँदों ने
यह क्या करामात कर दी
कि एक मरुस्थल में भी
जीने की ख्वाहिश भर दी।

kitni tarif karun ?
sach pyar mein kitni shakti hoti hai.

bahut hi sundar bhavon ko piroya hai.

shelly kakkar said...

bahut hi kamaaal....pyar hota hi aisa hai.....

Nirmla Kapila said...

तुम्हारे प्यार की
कुछ बूँदों ने
यह क्या करामात कर दी
कि एक मरुस्थल में भी
जीने की ख्वाहिश भर दी
बहुत सुन्दर प्रेमाभिव्यक्ति है कौंके जी बहुत बहुत बधाई

Dr. Amarjeet Kaunke said...

nirmala ji, shelly ji aur vandana ji aapka bahut dhanyabad poem padne aur comment karne k liye....

"Nira" said...

तुम्हारे प्यार की
कुछ बूँदों ने
यह क्या करामात कर दी
कि एक मरुस्थल में भी
जीने की ख्वाहिश भर दी।

amarjeet ji
in shabdon mein itni takat hai
kisi mein bhi jaan daal dain
bahut hi pyaar aor sneh bhari kavita hai, mubarak ho

Babli said...

तुम्हारे प्यार की
कुछ बूँदों ने
यह क्या करामात कर दी॥
बहुत ख़ूबसूरत और भावपूर्ण रचना लिखा है आपने! आखिर इसे ही प्यार कहते हैं! इस शानदार रचना के लिए बधाई!

neha said...

तुम्हारे प्यार की
कुछ बूँदों ने
यह क्या करामात कर दी
कि एक मरुस्थल में भी
जीने की ख्वाहिश भर दी
wah bahut sunder.....in shabdo mein bahut gherai mein jaa kar aache se dil k bhaav wayaqt kiye apne....

indu said...

अमरजीतजी,
पहली कविता तीन बार पढने के बाद कुछ कहना चाहूंगी
आप बहुत सरल एवं सम्वेदनशील हैं आपकी कविता के कोमल भाव बतलाते हैं
भाई! ईश्वर ने इस पृथ्वी को बहूत सुंदर बनाया है
यहाँ प्यार है ,दोस्ती है और यहाँ हमारे अपने हैं ,जिनके बिना जीने की हम कल्पना भी नही कर सकते .रहा दर्द ,अपने hi देते हैं
आपके दुःख का बायस मै नही हो सकती मेरे दुःख का आप नही
ठीक भी हैअपने ना होते तो हमे मालूम hi नही होता की दुःख किसे कहते हैं
फिर सुख का आनंद कैसे लेते ?
पर...सबसे खूबसूरत है 'प्यार' , जिसकी ताकत का hi हर कहीं अपनी कविता
मे ज़िक्र किया है न आपने ,इसे दूसरों को देने की आदत बना ले अगर हम तो .....?लाख लोग बुरे हैं ,इस काबिल भी नही अधिकांश ...
पर 'वीरजी ' हम यहाँ से जाएगे तो मन मे एक शांति रहेगी
किसी ने हमे नही दिया, पर देखो हमने सब को दिया hi नही लुटाया क्योकि
हमारे पास देने को इस से बढ़ कर कोई चीज थी नही
अपनी कविताओ को जी जाओ ,मेरे वीर
प्यार ईश्वर का दिया सबसे सुंदर तौहफा रहा है और रहेगा हमारे पास
यही ब छलका है आपकी कविता मे
लिखो क्योंकि फीलिंग्स बड़ी पवित्र है आपकी
इंदु पुरी

Anamika said...

jeet ji shukriya apna blog id bhejne ka atleast apko padhne ka mauka mila....apki 3-4 poem padhi hai shabdo ka sanyojan bahut badhiya hai.pyar aur pyas ko khoobsurti se dhala hai.

Amritbir Kaur said...

A very meaningful poem...
"मेरे कण-कण ने
अपनी वीरानगी
अपनी तपिश
अपनी उदासी में
बहलना सीख लिया था"....wonderful lines...

om raj pandey"omi" said...

bahut khoob likh hai aap ne
bahut hi sunder rachana hai
jitni tareef ki jay kam hai