Saturday, August 1, 2009

गलती



तुम
मेरे हाथ की रेखा थी
खुदा ने
गलती से
किसी और के
हाथ पे खींच दी

खुदा की
इस गलती की सजा
पता नहीं हम

कितने जनम
और भुगतें...........

10 comments:

nidhi sharma said...

अमरजीत जी....आपकी कविता गलती एक मोहब्बत
से भरे दिल के मर्म को बहत ही खूबसूरती से बयाँ
करती है....ऐसे अहसास कहाँ से लाते हैं आप.....

vandana said...

bahut hi gahre bhav.

Babli said...

मेरे ब्लॉग पर आने के लिए और सुंदर टिपण्णी के लिए बहुत बहुत शुक्रिया!
मुझे आपका ब्लॉग बहुत अच्छा लगा! बहुत ख़ूबसूरत रचना लिखा है आपने! अब तो मैं आपका फोल्लोवेर बन गई हूँ इसलिए आती रहूंगी!मेरे अन्य ब्लोगों पर भी आपका स्वागत है!

amarjeet kaunke said...

ब्लॉग पर आने के लिए आपका सब का
स्वागत और थैंक्स......डॉ.अमरजीत कौंके

Dr. Tripat said...

ek ek shabd mein gehrai hai..kya khoob likha hai..

महफूज़ अली said...

Amarjeet ji....... namaskar....... main apka bahut hi shukrguzaar hoon ki aap mere blog pe aaye....... aur apne amulya comment se nawaaza.......

bahut bahut shukriya......


Ummeed karta hoon.......ki....... aage bhi aise hi hausla afzaai karte rahenge........

ThanX once again........


Regards

Mahfooz

Gurinder Singh Kalsi said...

A mind touching poem.
please visit my blog;
gurindersinghkalsi

Gurinder Singh Kalsi said...

good

शारदा अरोरा said...

थोड़े शब्दों में जो कहना था कह दिया है , सुन्दर |
आपने ब्लॉग के बारे में लिखा है कि सब कुछ बदलता पाया पर कविता का दामन नहीं बदलता है , कविता से मुलाकात तो ऐसे है जैसे कोई खुद से मिल आता है , निश्चिन्तता के साथ गले लगाती है ये |मन का सारा गुबार ये ले लेती है , सबसे सगी यही तो हुई |
मेरे ब्लॉग पर भावों का बहता दरिया वाली टिप्पणी के लिए धन्यवाद , ऐसी टिप्पणी तो फनकार ही दे सकता है |

sukhveer said...

amarjit ji
this peom touch my heart realy