
जब से तुम
गई हो माँ !
घर तिनकों की तरह
बिखर गया है.....
तुम पेड़ थीं एक
सघन छाया से भरा
घर के आँगन में खडा
जिस के नीचे बैठ कर
सब विश्राम करते
बतिआते
एक दुसरे के
दुःख सुख में
सांझीदार बनते.....
तुम चली गई माँ !
तो वो पेड़
जड़ से उखड़ गया है
वैसे
तुम्हारे जाने के बाद
सब वैसे का वैसे है
घर की दीवारें
घर की छतें
पर बदल गए हैं
उन छतों के
नीचे रहते लोग
घर का आँगन वही है
लेकिन आँगन का
वो सघन छाया भरा
बृक्ष नहीं रहा
जिस के नीचे
बैठ कर
सभी
एक दुसरे से
बतिआते थे
अपने अपने
दुःख सुख सुनाते थे
अब वो
बृक्ष नहीं रहा माँ !
जब से तुम चली गई........
10 comments:
क्या खूब लिखा हैं आँख भर आई ये अहसास बच्चो को तभी होता हें जब माँ चली जाती हें
भूतनाथ का गाना अब क्या दुन्ढे पगले डूब गया सूरज कब का ( समय का पहिया चलता हें )
वही भाव
लेकिन आँगन का
वो सघन छाया भरा
बृक्ष नहीं रहा
जिस के नीचे बैठ कर
सभी एक दुसरे से
बतिआते थे
अपने अपने
दुःख सुख सुनाते थे
बहुत सुन्दर. आपकी किताब का अभी तक इन्तज़ार कर रही हूं.
बेहद भावपुर्ण .........माँ की याद आ गयी.......आप ऐसे ही लिखते रहे.
हर माँ को ऐसा बेटा नसीब हो ,जो उसे इस तरह याद kare!
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Bhavuk kar dene wali abhivyakti !!
BAHUT KHOOBSOORAT YAAD HAI MA KI.
माँ के ऊपर एक बेहद भावपूर्ण कविता है ये....बहुत अच्छी
amarjeet ji ko pranam
sahi kaha hai apne Maa har Ghar ka vraksh hoti hai.. aur vraksh ke baad hi uski chaya ki kami ka pata chalta hai...
जब से तुम
गई हो माँ !
घर तिनकों की तरह
बिखर गया है.....
bahut hi mermsprshi kvita hai.......
First one is almost like a sufi poem, addressing loved one as well as almost seems like addressing god at the same time!
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